सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अप्रैल, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दस रूपयों की खुशियाँ

  एक वर्ष से घर में ही बंद हैं और शाम का समय था तो सोचा , बस कुछ और नहीं तो मन के सुकून लिए ही टहल लिया जाये थोड़ा। लॉकडाउन में हमारी ही तरह सब ऐसे ही बेबस से हैं अपने अपने घरों में। हालाँकि एक वर्ग , निम्न वर्ग जो किसी सरकार को , किसी फ़िल्मी हस्ती को दिखाई नहीं देता , क्योंकि यह वर्ग ना तो कोई टैक्स भरता है , ना ही फ़िल्मों को हिट करवाता है , बस बड़े लोगों की भड़ास निकालने के काम आता है , बाकी के कामों के अलावा। ऐसे निम्न वर्ग के लोग जो वैसे ही किसी तरह गुज़ारा करते थे अब तो पुरानी झोपड़ियाँ छोडकर शहर से दूर रहने के लिए विवश हो गए हैं , जहाँ चाहे बिजली ना हो , पानी ना हो पर कम से कम रोज़ रोज़ किराया या हफ्ता मांगने वाले सरकारी , गैर सरकारी गुंडे तो नहीं आएँगे। शहर के बाहर कच्ची पक्की सड़क किनारे इन्होंने नए झोपड़े तैयार कर दिए। हाँ पुराने की तरह उतने स्थाई और सुरक्षित तो नहीं हैं पर अब एक साल बाद इनके पास बचा ही क्या लूटने के लिए , इनकी जान को छोडकर। झोपड़ों से कुछ ही दूरी पर पाँच-छह वर्ष के बच्चे खेल रहे थे। खेल क्या , वहाँ पड़े कचरे के ढेर में से कुछ चुन रहे थे। शायद कुछ ऐसा जिस...