एक वर्ष से घर में ही बंद हैं और शाम का समय था तो सोचा, बस कुछ और नहीं तो मन के सुकून लिए ही टहल लिया जाये थोड़ा। लॉकडाउन में हमारी ही तरह सब ऐसे ही बेबस से हैं अपने अपने घरों में। हालाँकि एक वर्ग, निम्न वर्ग जो किसी सरकार को, किसी फ़िल्मी हस्ती को दिखाई नहीं देता, क्योंकि यह वर्ग ना तो कोई टैक्स भरता है, ना ही फ़िल्मों को हिट करवाता है, बस बड़े लोगों की भड़ास निकालने के काम आता है, बाकी के कामों के अलावा। ऐसे निम्न वर्ग के लोग जो वैसे ही किसी तरह गुज़ारा करते थे अब तो पुरानी झोपड़ियाँ छोडकर शहर से दूर रहने के लिए विवश हो गए हैं, जहाँ चाहे बिजली ना हो, पानी ना हो पर कम से कम रोज़ रोज़ किराया या हफ्ता मांगने वाले सरकारी, गैर सरकारी गुंडे तो नहीं आएँगे। शहर के बाहर कच्ची पक्की सड़क किनारे इन्होंने नए झोपड़े तैयार कर दिए। हाँ पुराने की तरह उतने स्थाई और सुरक्षित तो नहीं हैं पर अब एक साल बाद इनके पास बचा ही क्या लूटने के लिए, इनकी जान को छोडकर। झोपड़ों से कुछ ही दूरी पर पाँच-छह वर्ष के बच्चे खेल रहे थे। खेल क्या, वहाँ पड़े कचरे के ढेर में से कुछ चुन रहे थे। शायद कुछ ऐसा जिसे बेचकर इनके माँ-बाप खाने का जुगाड़ कर सकें। हमने खड़े रहकर कुछ देर बातें कीं और नन्हें नन्हें बच्चे भी कितने शिष्टाचार से बात कर रहे थे। यह देखकर मुझे कॉन्वेंट और सीबीएसई फलाना ढिमका में जाने वाले कुछ बच्चे याद आ गए जिनसे मैंने जब एकाध बार बात की थी तो लगा ही नहीं कि आदमी के बच्चे हैं या...
खैर, ये बच्चे इतनी निर्धनता में भी इतनी मीठी मुस्कान से बातें करने लगे कि सीधे दिल में बस गए। हमने उनसे उनका नाम पूछा और कहा कि अगली बार कुछ लाएँगे आपके लिए, तो एक बच्चा तुरंत थैंक यू बोल पड़ा। हम आगे बढ़ गए, पर पता नहीं हमारे पैर बार बार उनकी ओर जा रहे थे। हमने एक मेडिकल स्टोर, दवाई की दुकान ढूँढकर क्योंकि इस लॉकडाउन में शाम के समय केवल मेडिकल स्टोर ही खुले रह सकते हैं, तो वहाँ से दस रूपयों वाले बिस्कुट के कुछ पैकेट लिये और लौटकर उसी जगह आए, पर यह क्या, यहाँ तो एक भी बच्चा नहीं था। पहले तो मन उदास हुआ पर तब याद आया कि बच्चों ने बताया था कि वे वहीं आगे जो झोपड़ें बने हुए थे वहाँ अपने परिवार के साथ रहते हैं। हम वहाँ पहुँचे तो एक दंपति झोपड़ों के बाहर बैठे बात कर रहे थे। हमने पूछा, “गणेश कहाँ है?” महिला ने गणेश को आवाज़ लगाई और तुरंत गणेश के साथ उसके वे बाकी के साथी भी आ गए। हमने उन्हें वो पैकेट दिए और सबके चेहरों पर वह मुस्कान देखकर जो खुशी हमें महसूस हुई, वह कोल्ड कॉफी पीकर, सोशल मीडिया पर वायरल होकर, ऑफिस से प्रशंसा पाकर भी नहीं होती। बिस्कुट लेने के बाद वो बच्चे कुछ पल वहीं एक पंक्ति में खड़े रहे, पर हम आगे बढ़ गए। हमें थोड़े से बिस्कुट देते हुए उनके साथ तस्वीर खींचकर उनकी परिस्थिति का परिहास नहीं करना था। हमने हमारे हिस्से का योगदान किया और आगे बढ़ गए और काश! ये बड़े बड़े एनजीओ वाले, पैसे वाले, सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालने वाले भी किसी दिन बिना ढोल पीटे आगे बढ़ जाए। करन निम्बार्क, उपन्यासकार। 28 अप्रैल 2021, मुंबई।

आपने हकीकत बताने की कोशिश किया है बहुत बढ़िया 🙏🏻
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद।
हटाएंसही बताया आपने .यह अनुभव हमने भी किया है. वह मुस्कान अलग ही खुशी देती है.
जवाब देंहटाएंआभार।
हटाएंबेहतरीन,,,,
जवाब देंहटाएंआभार।
हटाएंजी सर जबरदस्त मन की स्थिति को (भड़ास) को अवश्य ही निकालना चाहिए ।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंबहुत खूब।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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